एक ख़त ज़िन्दगी के नाम

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एक ख़त ज़िन्दगी के नाम

“ज़िन्दगी” कहने को तो एक छोटा सा शब्द। पर इस छोटे से शब्द का मतलब समझने में ही कई ज़िन्दगी लग जाती है। और इन सबके बाद भी हम ज़िन्दगी का सही मतलब समझ पाए जरूरी नही।

हर व्यक्ति के लिए ज़िन्दगी का मतलब अलग होता है।

किसी के लिए ज़िन्दगी एक खेल है। तो किसी के लिए मज़ा। किसी के लिए संघर्ष। तो किसी के लिए सज़ा। किसी के लिए ज़िन्दगी एक जुआ है। तो किसी के लिए जमा पूंजी।

इन सब अलग-अलग अर्थो और मतलबों के बाद भी ज़िन्दगी का एक सामान्य अर्थ भी है।

ज़िन्दगी का सही/सामान्य अर्थ :

ज़िन्दगी जो भी हो, जिसकी भी हो, जैसी भी हो। पर हर एक के लिए एक सामान्य अर्थ जरूर है उसका कि –

“ज़िन्दगी एक सपना है”

अब ये सपना किसी के लिए सुहाना होता है, तो किसी के लिए डरावना। किसी के लिए लुभावना तो किसी के लिए भयामय। हमारी ज़िन्दगी किस सपने की तरह है ये निर्भर करता है हम पर।

हर व्यक्ति एक साथ दो ज़िन्दगी जीता है।

– एक वो ज़िन्दगी जो वो हमेशा से जीना चाहता है, जो उसका स्वप्न है।
– एक वो ज़िन्दगी जो वो अभी जी रहा है।

इन्हीं दोनों ज़िन्दगियों को एक करने की कोशिश में हम हमेशा लगे रहते है।

दोहरी ज़िन्दगी का ही एक लक्ष्य :

हमारी वो ज़िन्दगी जो हम आज जी रहे है। उसे किस तरह अपने सपनों की ज़िन्दगी की तरह बना ले इसी लक्ष्य को साधते है हम। और उसी के अनुसार सारे कार्य करते है। कभी सही, कभी गलत तो कभी बहुत गलत।

ज़िन्दगी कैसी ये पहेली? :

ज़िन्दगी खुद में सबसे बड़ी पहेली है जिसे कोई न तो समझ पाया न सुलझा पाया। पर एक मशहूर गीतकार एवं गायक के अनुसार –

“जीवन एक अधूरा सपना, कुछ देखा कुछ बाकी है।
दुख से सुख का रिश्ता नाता, कुछ देखा कुछ बाकी है।

इक आशा का जलता बुझता, दीपक ले कर साथ चला।
जीवन की इस घोर अंधेरी, राहों में दिन रात चला।
पग पग पर काँटों का डेरा, कुछ देखा कुछ बाकी है।

कौन है अपना कौन पराया, सब को जाना पहचाना।
काम न आए कोई यहाँ पर, ये जग भी है बेगाना।
जो था सो अपने भाग में लिखा, कुछ देखा कुछ बाकी है।”

नमस्ते, मैं मोगली,

आप सोच रहे है कि आज की शुरुआत इतनी गम्भीर क्यों?

तो आपको बता दूं कि अब मोगली बुड्ढा हो गया है। और बूढ़े लोग गम्भीर बातें ही करते है।

मोगली अब बूढ़ा हो गया है और जीवन के अंतिम पड़ाव पर है। उसके बच्चे अपनी-अपनी ज़िन्दगी में व्यस्त है। और उन्ही सब राहों से गुज़र रहे है जिनसे कभी मोलगी गुज़रा था। जब वो उस उम्र के पड़ाव पर था।

मोगली ने जीवन के आरम्भ के साथ जो सफर शुरू किया था। वो कई खुशियों, गमों, अच्छे और बुरे अनुभवों से होता हुआ अब अंतिम दौर में है।

ये सफर आरम्भ हुआ था जीवन के आरम्भ के साथ :

बच्चा होना बच्चों का खेल नही

तब मोगली बच्चा था। हर तरफ उछलता, कूदता और उधम मचाता बच्चा। माँ-बाप और परिवार का दुलारा बच्चा।

फिर हर बच्चे की तरह ये बच्चा भी थोड़ा बड़ा हुआ। बड़े होते ही सबसे पहला सामना हुआ स्कूल से। स्कूल ने सिखाए नए सबक। कभी दोस्ती के तो कभी दुश्मनी के। कभी प्यार के तो कभी टकरार के।

इन सबको में सबसे महत्वपूर्ण सबक था अच्छे व्यक्तित्व का। अच्छे इंसान बनने का। क्योंकि जीवन के अंत में हमने क्या किया, क्या पाया या क्या खोया। इन सबसे कहीं ज्यादा महत्वपूर्ण होता है कि हम जिए कैसे।

लोग हमारे जाने के बाद हमे कैसे याद करते है। याद करते है भी या नही।

ये सबक हमे जीवन के प्राम्भिक काल में ही मिल गया था।

अगला पड़ाव (यौवन का आरंभ) :

इन सब सबको के साथ हम गए माध्यमिक विद्यालय :

मोगली की विद्यालय गाथा

वहाँ हुई पढ़ाई, प्यार, गहरी दोस्ती और जीवन बनाने की शुरुआत। वहाँ पहली बार देखा एक भविष्य का सपना जिसके केंद्र बिंदु हम थे।

उस समय व्यस्तता थी प्यार और दोस्ती में सामंजस्य बिठाने की। शौक़ और भविष्य में सामंजस्य बिठाने की। भूत की यादों और वतर्मान की कठनाईयों में सामंजस्य बिठाने की।

फिर आया कॉलेज :

युवा मोगली की जुदा ज़िन्दगी

विद्यालय में जो भविष्य का सपना देखा था उसे यहाँ एक रूप देना आरम्भ किया।
पहचान हुई नए दोस्तों से जो विद्यालय के बाद मिले। पहचान हुई प्यार से। पहली बार दिल ज़ोर से धड़का। पता चला कि इसका काम सिर्फ साँस लेना ही नही है।

इस समय व्यस्तता थी सामंजस्य बिठाने की –

– नए दोस्त और पुराने साथियों के बीच।
– बचपन की नादानियों और कॉलेज के एहसास के बीच।
– स्कूल के किस्सों और कॉलेज की ज़िन्दगी के बीच।
– सुनहरे भविष्य और वर्तमान के टशन के बीच।
– महंगे सपनों और खाली जेब के बीच।
– पहले प्यार और आने वाली ज़िम्मेदारियों के बीच।

इन सबमें सामंजस्य बिठाते-बिठाते समय कब निकल गया पता ही नही चला।

फिर आयी काम और ज़िम्मेदारी की बारी :

कल के सपने आज की हक़ीकत

कॉलेज खत्म होते-होते समय कब, कहाँ और कैसे निकल गया पता ही नही चला।

इसी बीच कल का मोगली कब आज का सुभाष बन गया ध्यान भी नही। कब दूसरों पर निर्भर रहने वाला मोगली आज घरवालों का सहारा बन गया पता भी नही चला।

वैसे तो ज़िन्दगी में कई बड़े बदलाव आते रहे समय-समय पर ये बदलाव उन सबसे कहीं बड़ा था। इसके साथ जीवन के मायने, उसका अर्थ ही बदल गया। ज़िम्मेदारी ने बचपन और जवानी दोनों को भुला दिया। कल तक जिस ज़िन्दगी का केंद्र हम थे आज वो केंद्र ही बदल गया।

मिथ्या, माया और हम :

इन सबके बाद जीवन के अंतिम पड़ाव पर वो ध्यान आया जो सबसे पहले पढ़ा था।

“अच्छे इंसान बनो, उस पार सिर्फ पुण्य जाएंगे”

फिर शुरू हुआ एक अंतिम सामंजस्य स्थापित करने का गुणा भाग कि कितने पुण्य किये और कितने पाप।

क्या खोया, क्या पाया, क्या किया अच्छा, क्या किया बुरा, कितना पुण्य और कितना पाप।

और इसी तरह जीवन हर चरण में सिर्फ सामंजस्य बिठाते निकल गया। अब तो बस ये ही इक्षा है कि

“इस जन्म का मोगली अगली बार कहीं टार्ज़न बन कर आये”।

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