मोगली की विद्यालय गाथा

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मोगली की प्राम्भिक यात्रा को आगे बढ़ाते हुए

नमस्ते, मैं मोगली; वो जो मुझे पहले से जानते है उन्हें शुक्रिया और जो मुझे नही जानते कृपया “बच्चा होना बच्चों का खेल नही” लेख में मुझसे मिले और मुझसे परिचित हो।

आपसे मेरी अंतिम मुलाक़ात में मैंने अपने विद्यालय जीवन के आरम्भ से पूर्व कुछ सवालों के जवाब जानने की ख़्वाहिश ज़ाहिर की थी।

वो सवाल कुछ इस प्रकार थे –
“यह आश्चर्यजनक है कि कैसे हम विद्यालय में शिक्षा ग्रहण करने के दौरान लापरवाह बच्चों से ज़िम्मेदार किशोरों/नागरिकों तक बढ़ जाएंगे। हमारे पाठ्यक्रम में ऐसा क्या होगा जो हमें ज़िम्मेदार बनाएगा। यह कौन सा बीज है जो हम आज शुरुआत में बोएगें और जो बढ़ेगा और बढ़ते-बढ़ते एक दिन एक बड़ा पेड़ बन जाएगा। इन सब सवालों के जवाब अभी मुझे नही पता लेकिन एक दिन जब मैं बड़ा हो जाऊँगा तब शायद जब मैं पीछे मुड़ कर अपनी बचपन से बड़े तक की ज़िन्दगी का अवलोकन करूँ तब समझ पाऊँ कि कैसे ये सारे परिवर्तन हुए और ये परिवर्तन कितने कारगर सिद्ध हुए।”

वर्तमान में मैंने अपने विद्यालय काल का जितना समय व्यतीत किया है उस दौरान मुझे काफ़ी सवालों के जवाब दिखाई देने लगे है।

जहाँ तक मुझे अभी समझ आया है कि विद्यालय में सिर्फ पढ़ाई ही नही होती जो हमें लापरवाह बच्चों से एक ज़िम्मेदार नागरिक में परिवर्तित करती है अपितु अन्य बहुत सारे कारक होते है जो इस जटिल प्रक्रिया को फलीभूत करते है।

विद्यालय में हमारा ही नही अपितु हमारे व्यक्तित्व का निर्माण होता है जिसके आधार पर हम ज़िम्मेदार बनते है।

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व्यक्तित्व क्या है इसका मुझे ज्यादा ज्ञान तो नही परंतु मेरी अध्यापिका दीदी से पूछने पर उन्होंने मुझे बताया कि –

हम कैसे चलते है, उठते है, बैठते है, कैसे हँसते-बोलते या खाते-पीते है यह सब हमारे व्यक्तित्व को दर्शाता है। हमारा दूसरो के प्रति व्यवहार एवं उनके और समाज के प्रति हमारे विचार ये सब हमारे व्यक्तित्व का प्रतिबिम्ब मात्र है। इसी व्यक्तित्व के आधार पर हमें समाज में पहचान और इज़्ज़त मिलती है। हमारे व्यक्तित्व निर्माण की प्रक्रिया दीर्घकालीन एवं अत्यंत ही जटिल यद्यपि निहायत ही सुगम एवं सरल है। व्यक्तित्व निर्माण का प्रथम एवं अंतिम दोनों चरणों का क्रियांवयन विद्यालय काल के दौरान ही होता है। विद्यालय हमारे जीवन में अतिमहत्वपूर्ण स्थान रखते है। विद्यालय ही वो जगह है जहाँ हमारे व्यक्तित्व निर्माण का आरम्भ होता है।

व्यक्तित्व निर्माण में विद्यालय का महत्व:

विद्यालय हमारे व्यक्तित्व निर्माण की पृष्ठभूमि होती है। इसी काल के दौरान हमारे व्यक्तित्व निर्माण की आधारशिला रखी जाती है और तदोपरांत उस पर एक विशाल एवं प्रभावशाली व्यक्तित्व का निर्माण किया जाता है। वैसे तो अगर देखा जाए तो विद्यालय एक दीर्घकालीन समयावधि होती है, सामान्यतः यह काल शिशुवाटिक से आरंभ हो कर कक्षा 12 तक चलता है। परंतु यदि इस समयावधि का गहराई से और ध्यान से अध्यन किया जाए तो इसे निम्न श्रेणियों में विभाजित किया जा सकता है।

प्रारंभिक चरण:

वस्तुतः यह समयावधि शिशुवाटिका से कक्षा प्रथम के आरम्भ तक होती है। इस समयावधि में हमें बिल्कुल प्राम्भिक चीज़ों से परिचित करवाया जाता है जैसे स्वयं के अतिरिक्त अन्य लोगों से पहचान करना और उनसे मिलना। इसी दौरान हमे प्रारंभिक सामाजिक तौर-तरीकों से भी अवगत कराया जाता है जैसे अपनी वस्तुओं को लोगों के साथ बाँटना और उन्हें साझा करना। इन सब तरीकों से हमे समाज में समाज के साथ रहने लायक बनने में मदद मिलती है अर्थात हमे सामाजिक बनाया जाता है। इस कालावधि के दौरान हममें अतिशीघ्र एवं अत्यधिक परिवर्तन आते है।

माध्यमिक चरण:

यह चरण कक्षा प्रथम (1) से कक्षा षष्टम (6) तक होता है। इसी चरण के दौरान हमारे व्यक्तित्व के अधिकांश भाग का निर्माण हो जाता है, इस दौरान हमे पूर्णरूप से सामाजिक, मिलनसार एवं सभ्य बनाया जाता है। इस दौरान आने वाले परिवर्तन संभवतः हमारे व्यक्तित्व की दिशा एवं दशा दोनों का निर्धारण करते है। इस दौरान आने वाले परिवर्तन शीघ्र एवं दीर्घकालिक होते है।

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अंतिम चरण:

वैसे तो व्यक्तित्व निर्माण एक जीवनपर्यन्त चलने वाली महत्तपूर्ण एवं सतत प्रक्रिया है जो ताउम्र चलती रहती है, परंतु विद्यालय के अंतिम वर्षों तक इस प्रक्रिया का लगभग सम्पूर्ण भाग पूरा हो जाता है। इस समयावधि के उपरांत हममें ज्यादा और अतिशीघ्र परिवर्तन नही होते। वस्तुतः यह समयावधि कक्षा सप्तमं (7) से द्वादश (12) तक होती है। तदोपरांत हम सिर्फ और सिर्फ उसी दिशा में अग्रसर रहते है जिस दिशा का चयन हमने अपने इस काल के दौरान किया है।

मोगली का विद्यालय:

मैं अब व्यक्तित्व निर्माण के अंतिम चरण में हूँ। अब मेरी उम्र 15 वर्ष है और मैं कक्षा 10 में अध्यनरत हूँ। जल्दी ही मेरा सामना मेरी पहली बोर्ड परीक्षाओं से होगा। वैसे तो घर में आज कल सब ठीक है और अब मुझे ज्यादा डांट का सामना भी नही करना पड़ता लेकिन हाँ पढ़ाई अभी भी एक विशाल समस्या बनी हुई है और शायद एक दो साल तक और बनी ही रहेगी।

मेरा अब तक का विद्यालय का सफ़र वैसे तो काफ़ी हसीन और सुहावना रहा है परन्तु जैसा कि हर चीज़ के दो पहलू होते है उसी प्रकार से मुझे भी इस सफ़र में समय-समय पर कुछ और कभी-कभी कुछ ज्यादा ही परेशानियों का सामना करना पड़ा।

विद्यालय की परेशानियां:

वैसे तो अगर किसी बच्चे से पूछा जाए तो मुझे यकीन है कि बहुत कम ही बच्चें होंगे जो विद्यालय के दौरान उत्पन्न पढ़ाई की समस्याओं से दो-चार न हो और उन्हें अच्छा कहे। मुझे तो लगता है की विद्यालय नाम से ही पढ़ाई क समस्या लगने लगती है। पूरा दिन विद्यालय में कब निकल जाता है इसका हिसाब भी रखना असम्भव प्रतीत होता है। दिन के 10 पीरियड्स और उतने ही विषय अब कोई कब तक और कितना पढ़े, हमारे पास सिर्फ पढ़ना ही एकलौता काम नही है हमे भी अपनी ज़िन्दगी जीनी है कुछ करना है अपने लिए।

मुझे तो ये समझ नही आता की यार अगर दिन के 10 घंटे हम विद्यालय में व्यतीत करते है तो उसी समय में पढ़ा लो सब ताकि बचे हुए दो चार घंटे हम खुद को दे सके, लेकिन ये सुविधा हमे कहाँ, विद्यालय के 10 घंटो के बाद सामना होता है गृहकार्य से। विद्यालय में 10 घंटे में भी हमे पढ़ा न पाने के बाद हमारे घर के लिए पढ़ाई साथ भेज दी जाती है।

आशा करता हूँ कि काश कोई सरकार कभी हम बच्चों के लिए भी सोचे, फिर सोचता हूँ कि अगर सरकार कुछ करती भी है तो अगले दो सालों में तो कुछ कर ही नही पाएगी और उसके बाद किया तो मेरा क्या फायदा क्योंकि तब तक तो मेरा विद्यालय समाप्त हो चुका होगा और मैं कॉलेज में हूँगा। लेकिन फिर भी आशा करता हूँ कि सरकार कभी हम बच्चों की परिस्थितियों और परेशानियों पर भी ध्यान दे और हमारे व्यक्तिगत लाभ हेतु कुछ कदम उठाए जिनसे आने वाले बच्चें बेचारे हमारी तरह दुखी और परेशान न महसूस करे।

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मेरी एक परेशानी विद्यालय पाठ्यक्रम के विषयों को ले कर भी है। अब आप ही सोचिए हमे हर विषय पढ़ाने के लिए अलग-अलग अध्यापक और हमारे पढ़ने के लिए सारे विषय अब ये कहाँ का इंसाफ़ है।

हिंदी के अध्यापक से अगर गणित पूछो तो वो नही बताते और गणित वाले संस्कृत की समस्याओं का समाधान नही करते तो हमसे उम्मीद क्यों की जाती है कि हम सारे विषयों की समस्त समस्याओं का समाधान कर ले।

मुझे तो नही लगता कि रसायन विज्ञान के सूत्र पाठ्यक्रम से बाहर कभी हमारे काम आये हो या बाबर के युद्ध का हमारी आज की सामाजिक ज़िन्दगी से कुछ लेना-देना हो या शेक्सपियर के नाटक हमे जीवन में काम आते हो। तो ऐसे विषय जिनका हमारे सामान्य जीवन में कोई कार्य नही वो हम पर अतरिक्त बोझ स्वरूप क्यों लाद दिए जाते है।

इसी विकट समस्या का हल ढूंढने हेतु मैं अपने विद्यालय के प्राचार्य (प्रधानाचार्य) महोदय से मिला, पहले तो वो मेरी इस समस्या को सुनने के बाद थोड़ा सहमे फिर मुझे दो-तीन बार देखा, उनकी इन हरक़तों से मुझे लगा कि बेटा आज कुछ गलत कर ही दिया लगता है अब भगवान ही रक्षा करे परंतु शायद भगवान उस दिन पूरे मूड में थे तुरंत ही मेरी प्रार्थना सुन ली और मुझे पिटने से बचा लिया

प्राचार्य महोदय ने मुझे बड़े ही प्यार से समझाया कि इन समस्त विषयों और हमारे संपूर्ण पाठ्यक्रम का सिर्फ हमारे वर्तमान से ही नही अपितु हमारे भूत और भविष्य काल से भी अटूट संबंध है। इतिहास हमे पूर्व की गलतियों से सीखने की प्रेरणा देता है, भूगोल हमें हमारे जीवन का सार बताता है। और जहाँ तक बात रही बाकी विषयों कि तो जब बच्चा विद्यालय में प्रवेश लेता है तो न तो उसे न ही किसी और को निश्चित होता है कि ये आगे भविष्य में क्या बनेगा एक डॉक्टर, एक इंजीनियर (अभियांत्रिक) या कोई वैज्ञानिक इसलिए उसका परिचय सब विषयों से कराया जाता है जिससे वो स्वयं को और बाकी लोग उसकी क्षमताओं को पहचान सके और उसी आधार पर उसका भविष्य निर्धारित हो।

जिस विषय में उसकी विशेष रुचि होती है वो उसी के अनुसार अपने जीवन के आगे के मार्ग का चयन करता है।

प्राचार्य महोदय की यह बात मुझे समझ आ गई परंतु पढ़ाई अभी भी अपार समस्या है। आशा करता हूँ कि कभी ये समस्या भी हल हो जाए।

अब आपसे विदा लेता हूँ परीक्षाओं की तैयारी करनी है, उम्मीद है जल्द ही आपसे फिर मुलाक़ात होगी।

5 comments

  1. आपके लेख में दम्म है मानना पड़ेगा आपके विचार को

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