बच्चा होना बच्चों का खेल नही

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नमस्ते, मैं मोगली, नहीं-नहीं वो जंगल बुक वाला मोगली नही, सिर्फ मोगली। एक सीधा, शांत और साधारण बच्चा जो शहर में ही पैदा हुआ और यहीं पला बढ़ा है इंसानो के ही बीच, जंगल में नही।

वैसे अगर देखा जाए तो मेरी ज़िन्दगी और उस जंगल बुक वाले मोगली की ज़िन्दगी में ज्यादा फर्क है नही। एक समानता तो आप लोग ही समझ गए होंगे, जी हाँ हम दोनों का नाम एक ही है, बाक़ी की कुछ समानताएं मैं बता देता हूँ।

हम दोनों की उम्र 5 साल है, वैसे मैं अभी 5 का पूरा हुआ नही हूँ लेकिन 5 कहने में थोड़ा बड़ा सा लगता है तो 5 साल का ही हूँ। वो मोगली वैसे तो पूरी तरह से लकड़ी और जानवरों वाले असली जंगल में रहता है और मैं इस शहर के कंक्रीट रूपी बड़ी-बड़ी इमारतों और इंसानों से भरपूर जंगल में। इसके अलावा उस मोगली की ज़िन्दगी भी बहुत परेशानियों से भरी और हमेशा ख़तरे में रहती है और मेरी भी। अंतर बस इतना है कि उसे ख़तरा है शेरख़ान और उसके दोस्तों से और मुझे चाचा, बाबा, दादी, पापा, भैया, दीदी और जब देखो तब चले आने वाले रिश्तेदारों से, ये सब जब देखो तब मुझे डाँटते रहते है और पीटने का बहाना ढूँढ़ते रहते है। इन सबसे बचने में ही मेरा सारा समय चला जाता है और इस वजह से मुझे सदैव सजक और चौकन्ना रहना पड़ता है।

मुझे इंतज़ार है उस दिन का जब मैं बड़ा हो जाऊँगा और अपनी ज़िन्दगी आज़ादी और पूरी तरह से अपने हिसाब से व्यतीत कर सकूँगा।

मोगली हुआ बड़ा

मैं अब बड़ा हो गया हूँ, अब कम से कम मुझे तो ऐसा ही लगता है। वैसे मुझे नही लगता कि कोई भी अपने को कभी छोटा मानता भी है। सब खुद को हमेशा बड़ा ही मानते है और बड़ा ही दिखाने के प्रयास में रहते है, खैर मैं खुद की बात कर रहा था। तो मैं सच में अब बड़ा हो गया हूँ, अगले सप्ताह मेरा जन्मदिन आने वाला है ये मेरा पाँचवाँ जन्मदिन होगा।

मैं अपने जन्मदिन को लेकर बहुत उत्साहित हूँ। हर वर्ष जन्मदिन पर मुझे बहुत सारे उपहार, खिलौने, नए-नए कपड़े और स्वादिष्ट खाने की वस्तुएं मिलती है, और तो और उस दिन मुझ पर कोई गुस्सा भी नही करता, वरना बाकी समय तो हर पल कोई न कोई मुझ पर गुस्सा ही करता रहता है, मुझे ये समझ नही आता ये बड़े लोग इतना गुस्सा लाते कहाँ से है?, मुझे तो ज्यादा गुस्सा नही आता। हाँ, जब मुझे कोई मनपसन्द वस्तु नही मिलती या कोई मेरी बात नही सुनता बस तब थोड़ा सा भले ही आ जाए अन्यथा मुझे बिल्कुल गुस्सा नही आता, सच्ची।

वैसे सब कहते है कि गुस्सा करना अच्छी बात नही इससे हमारे स्वास्थ्य पर गलत प्रभाव पड़ता है, पर फिर अगर देखा जाए तो हर तरफ टीवी हो या अख़बार, समाचार हो या विज्ञापन हर तरफ तो ये भी लिखा रहता है कि सिगरेट न पिए, तम्बाखू न खाए, पर कोई ध्यान देता है क्या, नही। तो जब बड़े अपनी ही कही बातों पर बिल्कुल ध्यान नही देते तो हम बच्चों से ये उम्मीद क्यों करते है कि हम उनकी बातों पर पूरा ध्यान दे और तो और सिर्फ ध्यान ही न दे बल्कि उन्हें माने भी। बताओ ये भी कोई बात हुई, क्यों माने हम उनकी हर बात वो मानते है हमारी हर बात।

कभी किसी बड़े से दिन में 10 बातें कहो देखना दिन के खत्म होने तक कितनी मानी जाती है, अरे आधे से ज्यादा बातें तो बड़े तुम्हे वहीं खड़े खड़े ही वापस लौटा जायेगे और बाक़ी बची आधी बातों में से एक बड़ा हिस्सा भविष्य के सुहावने सपनों के रूप में हमे दिखा कर भूल जायेगे। खैर मैं कह रहा था की मेरा जन्मदिन आने वाला है।

इंतज़ार की घड़ियां खत्म

हाँ तो आज आख़िर वो दिन आ ही गया जिसका मुझे पिछले एक साल से इंतज़ार था, आज मेरा 5वॉ जन्मदिन है। सुबह से ही घर में काफ़ी गहमागहमी है, रिश्तेदारों और मिलने वालों का बड़ा जमावड़ा है घर में। आज मैं इसलिए और भी उत्साहित हूँ क्योंकि आज मुझे दिन भर अभयदान प्राप्त है अर्थात आज मुझे कोई भी कुछ नही कह सकता क्योंकि आज मेरा दिन है।

कल शाम को मैंने सुना कि घर वाले मुझे स्कूल भेजने की तैयारियां कर रहे है, अब वो चाहते है कि मेरी पढ़ाई शुरू हो। मुझे ये बात बिल्कुल अच्छी नही लगी अभी मैं दिन भर खेलता हूँ, उधम मचाता हूँ और फिर मुझे न जाने क्या क्या करना पड़ेगा मैंने बड़े भैया को देखा है वो दिन भर पढ़ाई को लेकर परेशान रहते है और मम्मी पापा से डांट भी खाते रहते है। मुझे तो लगता है कि मैं अभी ही इतनी डाँट खाता हूँ और जब पढ़ने जाने लगूँगा तो और और डांट खानी पड़ेगी।

अभी मैं आराम से दिन भर खाता और खेलता हूँ, बचे हुए समय में टीवी देखता रहता हूँ। टीवी से याद आया, आज कल टीवी वाले बच्चों को बेवकूफ समझते है या बड़ो को या दोनों को ही।

टीवी पर कुछ भी दिखाते है विज्ञापन के नाम पर और उसे भुगतान पड़ता है हम बच्चों को, जब देखो तब विज्ञापन के नाम पर कुछ भी दिखाते है, ये मंजन करो तो हर खेल में जीत जाओगे, ये ब्रश प्रयोग करो तो दांत मोती से सुंदर, ये साबुन लो तुम परी हो जाओगे, बोर्नबीटा लो तो 5 साल में ही ओपोम्पिक की टक्कर का खेलने लगोगे, और इन्ही सब विज्ञापनों के चक्कर में दिन में 4 बार दूध हमे पीना पड़ता है, और फायदा कद्दू नही होता।

ऊपर से मम्मी समझती है कि दूध पिला दिया अब तो बच्चा वैज्ञानिक नही तो अव्वल दर्ज़े का खिलाड़ी तो बन ही जाएगा। इन्ही विज्ञापनों ने हम बच्चो पर इतना ज्यादा अतिरिक्त बोझ डाल दिया है कि क्या बताये। खैर जैसा कि मैंने बताया था कि मेरे घर वाले मुझे इसी साल स्कूल भेजने की तैयारी में है देखते है स्कूल क्या नए रंग दिखाता है।

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स्कूल का आरम्भ:

आज मेरे स्कूल जाने का पहला दिन है, सब लोग बहुत उत्साहित है और मैं थोड़ा डरा और थोड़ा घबराया हुआ। न जाने क्या-क्या होगा वहाँ, कैसी होगी मेरी ये नई ज़िन्दगी। इन सबका जवाब तो तब ही पता चलेगा जब मैं स्कूल जाऊँगा।

स्कूल वैसे तो ठीक है लेकिन वहाँ ज्यादा आज़ादी नही है, हर समय स्कूल वाली दीदी का डर लगा रहता है, वो हमे खेलने का ज्यादा समय नही देती, सिर्फ पढ़ने पर ज़ोर देती रहती है। वो कहती है कि आज की ये पढ़ाई हमे आगे चल कर एक ज़िम्मेदार नागरिक, एक ज़िम्मेदार किशोर में तब्दील करेगी, एक दिन ये पढ़ाई हमे एक सफल और अच्छा इंसान बनाने में सहायक होगी।

लेकिन मुझे ये समझ नही आता कि आने वाले वर्षों में स्कूल हमें ऐसा क्या सिखाएगा कि हम धीरे-धीरे पूरी तरह परिवर्तित हो जायेंगे। यह आश्चर्यजनक है कि कैसे हम लापरवाह बच्चों से ज़िम्मेदार किशोरों/नागरिकों तक बढ़ जाएंगे। हमारे पाठ्यक्रम में ऐसा क्या होगा जो हमें ज़िम्मेदार बनाएगा। यह कौन सा बीज है जो हम आज शुरुआत में बोयेंगे और जो बढ़ेगा और बढ़ते बढ़ते एक दिन एक बड़ा पेड़ बन जाएगा। इन सब सवालों के जवाब अभी मुझे नही पता लेकिन एक दिन जब मैं बड़ा हो जाऊँगा तब शायद जब मैं पीछे मुड़ कर अपनी बचपन से बड़े तक की ज़िन्दगी का अवलोकन करूँ तब समझ पाऊँ कि कैसे ये सारे परिवर्तन हुए और ये परिवर्तन कितने कारगर सिद्ध हुए।

खैर वो सब तो बाद में समझ आएगा अभी मुझे ये समझ नही आ रहा कि ये पढ़ाई होती ही क्यों है और इसे इतने छोटे से क्यों पढ़ाते है?, अरे यार अभी बच्चा छोटा है उसके खेलने खाने के दिन है उसे आज़ादी दो, खेलने दो, उस नन्ही सी जान पर इतना बोझ वैसे ही है कि क्या खेले, क्या खाये, कहाँ घूमे और ऊपर से ये पढ़ाई का नया बोझ, बड़े तो बच्चों को कुछ समझते ही नही।

ये बड़े भूल जाते है कि ये भी बच्चे थे, शायद ये अपने बचपन का बदला हम बच्चों से लेते। मैं तो बिल्कुल परेशान हो गया हूँ यार समझ नही आता क्या करे और कैसे, हमे तो बस इतना समझ आया है कि सच में बच्चा होना कोई बच्चों का खेल नही है, अगर बच्चों की अपनी एक अलग दुनिया होती तो वहाँ इन बड़ो की दुनिया से कम परेशानियां न होती बल्कि दो-चार ज्यादा ही होती।

कुल मिला कर कम कहता हूँ ज्यादा समझो बच्चा होना बच्चों का खेल नही।

10 comments

  1. Parents duty is to give their child good values and
    to make them disciplined. We should let them take their decision on their own since childhood.

  2. अच्छा लिखते है जनाब एक बुक भी लिख कर मार्केट में डाल दीजिये

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