विकास जीवन का, बदलती सोच के साथ

Categories HindiPosted on

विकास एक क्रमिक तथा सतत रूप से होने वाला बदलाव या कहे तो एक सतत होने वाली प्रक्रिया है, जो शारीरिक वृद्धि के अवरुद्ध हो जाने के बाद भी चलता रहता है। यह जन्म से लेकर मृत्युपर्यंत चलता रहता है। यह क्रमबद्ध रूप से होने वाले सुसंगत परिवर्तनों की क्रमिक श्रृंखला है। कहने का तात्पर्य यह है कि ये परिवर्तन एक निश्चित दिशा में होते हैं जो सदैव आगे की ओर अग्रसर रहते है।

वृद्धि तथा विकास में अंतर: 

सामान्यतः वृद्धि तथा विकास का अर्थ एकसमान मान लिया जाता है लेकिन सही मायने में वृद्धि शब्द का प्रयोग, बढ़ती उम्र के साथ व्यक्ति के शारीरिक अंगों के आकार, लम्बाई, और भार में बढ़ोत्तरी के लिए किया जाता है। हम जैसे-जैसे बड़े होते है हमारे आकार, लम्बाई, नाक-नक्श आदि में परिवर्तन आने लगते है इसके स्थान पर नए नाक-नक्श आदि प्रकट होने लगते है। स्वयं में होने वाले इन बदलावों को हम देख सकते है, और दूसरे भी इन परिवर्तनों को देख और महसूस कर सकते है। अर्थात वृद्धि को मापा जा सकता है। सही अर्थों में विकास केवल शारीरिक आकार, और अंगों में परिवर्तन होना ही नहीं है अपितु यह नई विशेषताओं और क्षमताओं का विकसित होना भी है; जो गर्भावस्था से प्रारंभ होकर वृद्धावस्था तक चलती रहती है। विकास के परिणामस्वरूप व्यक्ति में नवीन विशेषताएं और नवीन योग्यताएं प्रकट होती है।

विकास की अवस्थाएं: 

मानव विकास एक निरन्तर चलने वाली सतत प्रक्रिया है जो विभिन्न अवस्थाओं से होकर गुजरती है। हमारे विकास के दौरान कई बड़े और बहुत सारे छोटे छोटे परिवर्तन समय समय पर आते रहते है, आने वाले इन्हीं परिवर्तनों के आधार पर हम मानव विकास के इस सफ़र को निम्न अवस्थाओं में विभाजित कर सकते है:

गर्भावस्था: यह अवस्था गर्भाधान से जन्म के समय तक, 9 महीने या 280 दिन तक मानी जाती है।

शैशवावस्था: जन्म से पांचवे वर्ष तक की अवस्था को शैशवावस्था कहा जाता है। इस अवस्था को समायोजन की अवस्था भी कहते हैं। हमारे प्रारंभिक व्यक्तित्व निर्माण और प्रारंभिक शिक्षा का आरम्भ इसी अवस्था में होता है।

बाल्यावस्था: पांच से बारह वर्ष की अवधि को बाल्यावस्था कहा जाता है। यह अवस्था शारीरिक और मानसिक विकास की दृष्टी से महत्वपूर्ण होती है। इस चरण को हम व्यक्तित्व निर्माण का प्रथम चरण भी कह सकते है।

किशोरावस्था: बारह से बीस वर्ष की अवधि को किशोरावस्था माना जाता है। इस अवस्था को जीवन का संधिकाल कहा गया है। ये हमारे आने वाले सम्पूर्ण जीवन की दशा एवं दिशा दोनों का निर्धारण करने का चरण होता है। विकास के इसी चरण के दौरान हम अपने व्यक्तित्व का पूर्ण निर्माण करते है और ये निर्माण ही हमारे समस्त जीवन का आधार बनता है।

प्रौढ़ावस्था: इक्कीस से साठ वर्ष की अवस्था प्रौढ़ावस्था कहलाती है। यह गृहस्थ जीवन की अवस्था है जिसमें व्यक्ति को जीवन की वास्तविकता का बोध होता है और वास्तविक जीवन की अन्तःक्रियाएं होती है।

वृद्धावस्था: साठ वर्ष से जीवन के अंत समय तक की अवधि को वृद्धावस्था कहा जाता है। इस चरण में हम समाज एवं राष्ट्र निर्माण में अपना सम्पूर्ण योगदान देने के लिए प्रयासरत रहते है।

इन समस्त विकास चरणों को एक साथ जानना एवं समझना आसान नही है, अतः इन्हें एक एक करके समझने का प्रयास करते है।

गर्भावस्था एवं उसके दौरान होने वाले विकास की विशेषताएं:

इस अवस्था में बच्चा अपरिपक्व होता है तथा वह पूर्णतया दूसरों पर निर्भर रहता है। यह अवस्था संवेग प्रधान होती है, इस अवस्था के परिपक्व होने तक बच्चों के भीतर लगभग सभी प्रमुख संवेग जैसे- प्रसन्नता, क्रोध, हर्ष, प्रेम, घृणा, आदि विकसित हो जाते हैं।

बाल विकास हर मनुष्य के जन्म से लेकर किशोरावस्था के अंत तक उनमें होने वाले जैविक और मनोवैज्ञानिक परिवर्तनों को कहते हैं। जब हम धीरे-धीरे निर्भरता से स्वायत्तता की ओर बढ़ते हैं। विकासात्मक परिवर्तन, परिपक्वता के नाम से जानी जाने वाली आनुवंशिक रूप से नियंत्रित प्रक्रियाओं के परिणामस्वरूप या पर्यावरणीय कारकों और प्रारंभिक शिक्षण के परिणामस्वरूप हो सकता है, लेकिन आम तौर पर ज्यादातर परिवर्तनों में दोनों के बीच का पारस्परिक संबंध शामिल होता है।

गर्भावस्था के उपरान्त हमारा बचपन आरम्भ होता है, परन्तु हमारा बचपन सिर्फ जीवन का एक भाग नही है अपितु जीवन के विकास का आरंभ और आने वाले जीवन की आधार भूमि है। बचपन में जो हम सीखते, समझते, जानते है वो जीवनपर्यंत हमारे मस्तिष्क में विद्द्मान रहता है और हमारी आगे की जीवनशैली उन्ही आदतों और सिद्धांतो के आधार पर अग्रसर होती है।

संक्षेप में यदि कहा जाए की बचपन हमारे जीवन का सबसे महत्वपूर्ण चरण है तो यह कदापि गलत नही होगा। परंतु हमारा बचपन और उस दौरान होने वाला विकास सिर्फ कुछ वर्षों का नही होता, आयु-संबंधी विकास अवधियों और निर्दिष्ट अंतरालों के आधार पर हम जीवन के प्रारंभिक विकास को निम्न भागों में वर्गीकृत कर सकते हैं:

नवजात (उम्र 0 से 1 महीना)
शिशु (उम्र 1 महीना से 1 वर्ष)
नन्हा बच्चा (उम्र 1 से 3 वर्ष)
स्कूल से पूर्व बच्चा (उम्र 4 से 6 वर्ष)
स्कूल के दौरान बच्चा (उम्र 6 से 13 वर्ष)
किशोरावस्था का आगमन (उम्र 13 से 17 वर्ष)

Photo by Henley Design Studio from Pexels

नवजात और शिशु अवस्था में हमे स्वयं न तो कुछ पता होता है और न ही हम ज्यादा कुछ समझते है। विकास के इस चरण में हम पूर्ण रूप से दूसरों पर निर्भर होते है, परंतु हमारा विकास इसी दौरान आरम्भ हो चुका होता है। बचपन के पहले छ: वर्ष सबसे अधिक महत्वपूर्ण होते है, क्योंकि इसी समय में हमारा मानसिक विकास सबसे तीव्र गति से होता है। इस उम्र के अनुभवों का असर आने वाले कई वर्षो तक दिखाई देता है। जीवन के पहले तीन वर्ष भाषा और शब्दावली के विकास में सबसे महत्वपूर्ण होते है।

इस उम्र में बड़ी तेजी से शारीरिक एवं मानसिक विकास होता हैं। इसी उम्र में हम सर्वाधिक उत्सुक नज़र आते है। जैसे जैसे हमारा शारीरिक विकास होता है, हम सामाजिक एवं सांस्कृतिक रूप से विकसित और परिपक्व होते जाते है। धीरे धीरे हम बहुत जल्दी अपने वातावरण में घुल-मिल जाते है और अपनी कल्पनाशीलता के द्वारा भूतकाल एवं वर्तमान में आए अनुभवों को संजोने का प्रयास करते है।

बाल्यवस्था के इसी चरण में ही भाषा का विकास होता है, संकेतों की भाषा समझ में आने लगती है। इसी उम्र में अहंकार भी जागृत होता है जिसके द्वारा दो लोगो के विचारों की असमानता भी हमे समझ में आती है। इसी समय में हम कल्पनालोक में भी विचरण करते है।

विकास के इस चरण में शारीरिक क्षमता, वैचारिक परिपक्वता एवं उचित सामाजिक विन्यास के लिए आवश्यक विश्वास, आदतें एवं रवैया तैयार होने के लिए घर पर मिलने वाली प्रारंभिक शिक्षा का समय सबसे प्रभावशाली एवं उचित होता है। इसी शिक्षा के अनुसार एवं परिणाम स्वरूप हमारे व्यक्तित्व के विकास का आरंभ होता है। हम जो भी इस उम्र में सीखते है आने वाले कई वर्षों तक उसी के अनुरूप विचार एवं व्यवहार करते है, तदोपरांत हमारे व्यक्तित्व निर्माण का प्रथम चरण आरम्भ होता है।

बच्चों के इष्टतम विकास को समाज के लिए महत्वपूर्ण माना जाता है और इसलिए बच्चों के सामाजिक, संज्ञानात्मक, भावनात्मक और शैक्षिक विकास को समझना जरूरी है।

आरम्भ में बच्चे खेल प्रक्रिया के माध्यम से सक्रिय रूप से और सम्यक तरीक़े से सीखते हैं। बच्चे के सीखने में मदद करने में वयस्को की भूमिका बच्चे के लिए उपयुक्त सामग्री प्रदान कराना है जिससे बच्चा सही प्रकार से अंतर्क्रिया द्वारा स्वयं का निर्माण कर सके। बच्चे को उनकी गतिविधियों के विषय में सोचने के लिए प्रोत्साहित करते हुए उन्हें स्वयं चीज़ों को जानने देना चाहिए, वयस्कों को बच्चों को उनके स्पष्टीकरण में विरोधाभासों को दिखाने की कोशिश करनी चाहिए।

विकास के चरण:

प्रारंभिक विकास: (जन्म से लेकर लगभग 2 साल की उम्र तक)

इस चरण के दौरान, हम प्रेरक और परिवर्ती क्रियाओं के माध्यम से अपने और अपने पर्यावरण के बारे में सीखते है। विचार, इन्द्रियबोध और हरकत से उत्पन्न होते है। हम यह सीखते है कि कैसे हम अपने पर्यावरण से अलग है और अपने पर्यावरण के पहलू अर्थात् माता-पिता या पसंदीदा खिलौने उस वक्त भी मौजूद रहते हैं जब वे अन्य लोगों की समझ से बाहर हो, इस चरण में हमारा शिक्षण (हमारी समझ का विकास) ज्ञानेन्द्रिय प्रणाली के फलस्वरूप होता है। हम हावभाव दिखाकर अर्थात् तेवर दिखाकर, एक कठोर या सुखदायक आवाज का इस्तेमाल करके व्यवहार को बदल सकते हैं।

Pexels

भाष्यात्मक एवं व्यावचारिक विकास: (3 से 7 साल की उम्र में)

इस चरण में हम अपने भाषा संबंधी नए ज्ञान का इस्तेमाल करते हुए वस्तुओं को दर्शाने के लिए संकेतों का इस्तेमाल करना शुरू करते है। इस चरण के आरम्भ में हम वस्तुओं का मानवीकरण भी करते है। जिसके फलस्वरूप हम अब बेहतर ढंग से उन चीजों और घटनाओं के बारे में सोचने एवं उनसे जुड़ने में सक्षम हो जाते है जो तत्काल मौजूद नहीं थे। जीवन के इस चरण में हमारी सोच पर कल्पना का असर अत्यधिक रहता है और हम चीजों को उन्हीं रूपों में देखते है जिन रूपों में हम उन्हें देखना चाहतें है और यह मान लेते है कि दूसरे लोग भी उन परिस्थितियों को हमारे नज़रिए से देख रहे हैं।

हम जानकारी हासिल करते है और उसके बाद उन जानकारियों को अपने विचारों के अनुरूप अपने मन में परिवर्तित कर लेते है। विकास के इसी चरण में हम प्रारंभिक तौर पर सीखना और पढ़ना तथा सक्रिय एवं अर्थपूर्ण तरीक़े से बोलना आरंभ करते है, साथ ही इस दौरान हमारी ज्वलंत कल्पनाओं और समय के प्रति उसकी अविकसित समझ का बोध होता है। जीवन के इस चरण में तटस्थ शब्दों, शरीर की रूपरेखा और छू सकने लायक उपकरण का इस्तेमाल करने से हमे सक्रिय शिक्षण में मदद मिलती है। इनका चिन्तन जीव वाद पर आधारित होता है, मतलब हम निर्जीव व सजीव सभी वस्तु/प्राणी को जीवित ही मानते है।

मानसिक सक्रियता का विकास: (पहली कक्षा से लेकर कक्षा 5 तक)

इस चरण के दौरान, समायोजन क्षमता में वृद्धि होती है। साथ ही साथ अनमने भाव से सोचने और इन्द्रियों से पहचानने योग्य या दिखाई देने योग्य घटना के बारे में तर्कसंगत निर्णय करने की क्षमता का विकास होता है, इस दौरान सीखने-पढ़ने के दौरान हम सवाल पूछने और चीजों या बातों को खुद समझने और वापस दूसरों को समझाने का प्रयास करते है और मानसिक दृष्टि से उस जानकारी का इस्तेमाल करने का प्रयत्न करते है।

संक्रियात्मक विकास:

विकास के इस चरण में अनुभूति को उसका अंतिम रूप प्रदान होता है। इस विकास चरण में हमें तर्कसंगत निर्णय करने के लिए अब पहचानने योग्य वस्तुओं की जरूरत नहीं पड़ती है। अब हम अपनी बात पर काल्पनिक और निगमनात्मक तर्क दे सकने में समर्थ होते है। अब हम सीखने-पढ़ने के क्षेत्र में काफी विस्तृत हो चुके होते है क्योंकि अब हम कई दृष्टिकोणों से कई संभावनाओं पर विचार करने में सक्षम होते हैं।

बचपन में हम प्रारंभिक रूप में व्यावहारिक अनुभव के माध्यम से सीखते हैं, इस दौरान जब हम कोई नई विषय वस्तु सीखने की कोशिश में होते है तब वयस्कों द्वारा समय पर और संवेदनशील हस्तक्षेप के माध्यम से नए कार्यों को सीखने में मदद मिलती है। इस दौरान हम नए ज्ञान का निर्माण पहले से मौजूद ज्ञान के आधार पर ही करते है। परंतु विकास का हर चरण सतत नही होता और हमारे विकास का यह प्रारंभिक चरण में निरंतरता और अनिरंतरता के भरपूर होता है।

विकास में निरंतरता और अनिरंतरता:

विकासात्मक परिवर्तन के कई पहलू सतत होते हैं परंतु वे परिवर्तन के दिखाई देने योग्य विशेषता को प्रदर्शित नहीं करते हैं। सतत विकासात्मक परिवर्तनों, जैसे कद में वृद्धि, चाल में परिवर्तन एवं अन्य शारीरिक परिवर्तनों में वयस्क विशेषताओं की तरफ काफी क्रमिक और पूर्वानुमेय प्रगति शामिल होती है। परंतु इस विकास के साथ कुछ असतत परिवर्तन भी होते है।

विकास के कई चरण एक साथ हो सकते हैं या विकास के अन्य विशिष्ट पहलुओं से जुड़े हो सकते हैं जैसे बोलना या चलना. यहाँ तक कि एक विशेष विकासात्मक क्षेत्र में भी किसी चरण में संक्रमण का मतलब यह नहीं हो सकता है कि पिछला चरण पूरी तरह से समाप्त हो गया है।

विकास का सीखने की क्षमता से सम्बन्ध:

हमारी चीज़ों को सीखने, समझने का सीधा संबंध हमारे विकास से है, जन्म से ही हम सीखना प्रारंभ कर देते है और जीवन पर्यंत सीखते रहते है, जैसे-जैसे आयु बढ़ती है हमारे अनुभवों के साथ-साथ हमारे व्यवहार में भी परिवर्तन आता है वस्तुतः हम अपने विकास की प्रत्येक अवस्था में कुछ न कुछ अवश्य सीखते है लेकिन प्रत्येक अवस्था में सीखने की गति एक सामान नहीं होती. शैशवास्था में बालक माता के स्तन से दूध पीना सीखता है, बोतल द्वारा दूध पिलाये जाने पर निपल मुहं में कैसे ले यह सीखता है, थोडा बड़े होने पर ध्वनी और प्रकश से प्रतिक्रिया करना सीखता है. इस प्रकार हम जैसे-जैसे बड़ा होते है अपनी जरूरतों और अनुभवों से सीखते रहते है।

इन सब चरणों से होते हुए हमारा सम्पूर्ण विकास होता है, परंतु यदि हमारे प्रारंभिक विकास के चरण या उन चरणों की परिस्थियाँ विकास के अनुरूप नही होते तो विकास का स्वरूप पूर्ण रूप से परिवर्तित हो जाता है।

1 comment

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *