एकाकी जीवन मे कमज़ोर पड़ते रिश्ते

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आज देश तेज़ी से तरक़्क़ी की राह पर बढ़ रहा है और देश की तरक्क़ी के साथ बढ़ रहे है हम; हर शहर मेट्रो बनने की दौड़ में अग्रसर है, रोज़ नित नई चुनौतियां सामने आ रही है और हम सब कुछ भूल कर बस एक अनजानी दौड़ में लगे हुए है। आगे निकलने की दौड़ पर इस दौड़ का हमारे निजी जीवन, हमारे परिवार, हमारे रिश्तों पर क्या प्रभाव पर रहा है उसका हमे इल्म भी नही, आज तेज भागती जिंदगी के बीच जहां एकल परिवार बढ़ते जा रहे हैं, वहीं आपसी रिश्तों में भी दूरियां और एकाकीपन बढ़ता जा रहा है। समाचार पत्रों में रोज़ नई घटनाओ से सामना हो रहा है, हाल में ही राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली में दो बहनों का खुद को महीनों तक घर में बंद रखना भी समाज के इस बदलते स्वरूप का स्याह पक्ष ही सामने लाता है। एक ओर यह घटना जहां रिश्तों के बीच बढ़ती दूरियां बयां करती है, वहीं मेट्रो सिटीज़ और व्यस्त समाज में रह रहे लोगों की संवेदनहीनता का भी उदाहरण प्रस्तुत करती है।

यह सही है कि शहरों में जिंदगी बहुत तेजी से भाग रही है और लोगों को आपसी रिश्ते निभाने के लिए भी समय नहीं मिल पा रहा है, लेकिन ऐसे में क्या अपनो को त्याग दिया जाना चाहिए? ऐसी घटनाओं के लिए रिश्तेदार यकीनन बहुत हद तक जिम्मेदार हैं, लेकिन ऐसी स्थिति में जब रिश्तेदार साथ नहीं देते, पड़ोसियों का दायित्व कहीं अधिक बढ़ जाता है। पड़ोसियों को चाहिए कि वे नजर रखें कि उनके पड़ोस में क्या घट रहा है और आवश्यकता पड़ने पर मदद की भावना के साथ आगे आएं। लोगों को रिश्तों का महत्व समझना चाहिए और उसे पर्याप्त समय देना चाहिए। उन्हें समझना चाहिए कि तेजी से भागती दुनिया में सबकुछ बदल जाता है लेकिन रिश्ते नहीं बदलते। रिश्ते अमूल्य हैं, उन्हें पूरी संवेदनशीलता के साथ निभाया जाना चाहिए।

वास्तविकता एवं काल्पनिकता में अंतर

आज हमारी परेशानियों और हमारे अकेलेपन का एक मुख्य कारण है हमारा काल्पनिक जीवन हम अपने वास्तविक जीवन से कही ज्यादा समय और ध्यान अपने काल्पनिक जीवन को दे रहे है हर समय फेसबुक, व्हाट्सएप्प, इंस्टाग्राम, ट्विटर आदि पर खुद को बड़ा और फेमस करने की अंधी दौड़ में लगे हुए है, हमे इस बात अंदाज़ा ही नही है कि हमारे चारो तरफ ही बहुत से लोग है जिनसे हम मिल सकते है बात कर सकते है और जिन्हें हमारी आवयश्कता है अथवा हो सकती है, परंतु उससे ज्यादा हम उन लोगो से मिलने और बात करने में व्यर्थ करे है जिन्हें हम जानते भी नही जो हमे कभी मील भी नही सोशल नेटवर्किंग साइट्स का जीवन ही अब हमे ज्यादा लुभावना और सत्य प्रतीत होने लगा है। हम अपनी इस सोशल लाइफ को हद से ज्यादा गंभीरता से लेने लगे है आज इस सोशल मीडिया की लाइफ हमारे वास्तविक जीवन से भी ज्यादा बड़ी होती जा रही है।

सोशल मीडिया का हमारे जीवन पर प्रभाव

इस सोशल लाइफ की वजह से हमारे वास्तविक रिश्तो में दूरियाँ आ रही है, वो टूटने की कगार पर आ रहे है, आज कल ऐसा आम है कि सोशल नेटवर्किंग साइट पर किसी तस्वीर को लाइक करने से आपके बने-बनाए संबंध में मनमुटाव पैदा हो गया? हैरान न हों, क्योंकि ऐसा अक्सर देखा गया है।

हमे ऐसा प्रतीत होता है कि हम सोशल मीडिया की वजह से ही हम अपने साथी से हर पल जुड़ा हुआ महसूस करते हैं, आप एक दूसरे से कितने ही दूर हों, लेकिन फिर भी दूरियों का पता नहीं चलता परंतु हम इस बात से अंजान हैं कि आज अच्‍छा और प्‍यारा लग रहा सोशल मीडिया रिश्‍तों में दूरियां और कड़वाहट भरने में अहम रोल निभा रहा है।

मनोविज्ञान की नज़र में सोशल मीडिया

सोशल मीडिया इन दिनों संबंधों को खराब करने वाला दानव बन चुका है। मनोचिकित्सकों के अनुसार, सोशल मीडिया पर ज्‍यादा टाइम बिताने से आपके संबंधों पर बुरा असर हो सकता है। मोनोचिकित्सको के अनुसार संबंधों के खत्म होने में सोशल मीडिया की भूमिका बढ़ती जा रही है, क्योंकि यह कई मायनों में आपकी निजता को खत्‍म करने वाला है। लगातार सोशल मीडिया साइटों पर सक्रिय रहने वाले लोग दूसरों को कम समय दे पाते हैं। फोर्टिस हेल्थकेयर के मानसिक स्वास्थ्य एवं व्यवहार विज्ञान विभाग के निदेशक समीर पारिख ने भी यही बात कही कि सोशल मीडिया के चलते लोगों की प्राथमिकताएं बदल रही हैं, जो संबंधों में दरार लाने वाला साबित हो रहा है।

सोशल मीडिया पर मिलने वाली झूठी या आधी-अधूरी कहानियों के प्रभाव में आकर लोग अपने साथी से अव्यावहारिक अपेक्षाएं पाल लेते हैं यानी वे अपने साथी से ऐसी-ऐसी उम्‍मीदें करने लगते हैं, जिन्‍हें पूरा करना व्यावहारिक नहीं होता। साथ ही उन पर उसी तरह की अवास्तविक जीवन पद्धति अपनाने का दबाव डालने भी लगते हैं। सोशल साइटों का ज्‍यादा इस्तेमाल करने से किसी रिश्ते की सबसे अहम बातों, जैसे विश्वास, निजी राय और वैयक्तिक स्वतंत्रता में कमी आती है किसने, किसकी, कौन सी तस्वीर शेयर की, किसने कहां और क्या कमेंट किया और यहां तक कि सोशल साइटों पर निजी चैट जैसी बातें संबंधों को खत्म करने वाली साबित होती हैं।

एक ओर जहाँ सोशल साइटों पर मानसिक तौर पर अत्यधिक उलझाव के कारण लोग अपने साथी के विचारों को ज्यादा जगह नहीं दे पाते। तो वहीं सोशल मीडिया पर होने वाली बातचीत में बहुत थकावट होती है जो दिमाग को जकड़ लेते हैं, ऐसे में कोई व्यक्ति कहीं शारीरिक तौर पर रहते हुए भी मानसिक तौर पर मौजूद नहीं रहता, क्योंकि उनके दिमाग में कुछ और बातें घूमती रहती हैं। किसी की टिप्पणी पर मिलने वाले लाइक और टिप्पणियां उसे सोशल साइट पर दिन में अधिक से अधिक बार जाने के लिए उकसाती हैं।

Photo by Helena Lopes from Pexels

अशांत एवं कमज़ोर रिश्तो की कड़ी

फेसबुक जैसे सोशल साइटों के उपयोगकर्ता सोशल साइटों पर मौजूद अन्य लोगों की जोड़ी से अपनी जोड़ी की तुलना करते हैं और कई बार वे किसी प्रख्यात हस्ती तक से अपने साथी की तुलना करने लगते हैं, जिससे संबंधों की गर्माहट में कमी आने लगती है जो समस्याओं को जन्म देता है। इस समस्या को स्मार्टफोन ने और बढ़ा दिया है और बेडरुम में वह ‘तीसरे व्यक्ति’ जैसी उपस्थिति रखने लगा है, जो पति-पत्नी के बीच रोमांस पनपने के लिए जरूरी निजता को खत्म कर देता है।

अपनी इसी निर्थक दौड़, वास्तविकता एवं काल्पनिकता के बीच फर्क न कर पाने की छमता और सपनों में खोए रहने की आदतो की वजह से ही हमारे निजी रिश्ते दिन प्रति दिन कमज़ोर होते जा रहे है और आज टूटने की कगार पर आ गए है, इन्ही कारणों से न तो हम काल्पनिक जीवन मे शांति का अनुभव करते है और न ही वास्तविक जीवन मे सुखी रह पा रहे है।

5 comments

  1. Well written by Praveen Shukla
    Jitni baate ham bado k mnn me hoti h..usse kahi jyada baate bchho k mnn me hoti h jo hm smjhne ka prayas bhi nhi krte aur unhe samaj ki so called achha bnne ki race me dauda dete h bina ye jane ki unke liye behtar h aur unka komal mnn kya chahta h….keep growing Praveen….good job…

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